सर्व प्रकाशिका नगरी काशी

काश्याम् मरणान् मुक्ति: ===

“असारे खलु संसारे सारमेतच्चतुष्टयम् ।
काशी वास: सतां सङ्गो गङ्गाम्भ: शिवपूजनम् ।।”

इस असार संसार में चार वस्तुएं सार है —– काशीवास, सत्संग, गङ्गाजल का सेवन और भगवान् शिव का पूजन।

श्री काशी जी का दूसरा नाम अविमुक्त है, क्योंकि भगवान् शंकर इसे छोड़कर कहीं नहीं जाते, अतः इसे अविमुक्त कहते हैं।

काशी तीन प्रकार की है ===

१. भौतिक काशी —- जो भूमि भारतवर्ष के उत्तर प्रदेश में है।

चिन्मय काशी समस्त भूमण्डल से मिली रहने पर भी शंकर जी के त्रिशूल पर स्थित है, क्योंकि वह प्रलय के जल में डूबती नहीं, छत्राकार जल में तैरती रहती है ।

जब प्रलय का जल काशी को डुबोना चाहता है, तब शिवजी त्रिशूल ऊपर उठा देते हैं, जिससे वह अंतरिक्ष लोक में चली जाती है ।

जब जल वहां पहुँचता है, तब त्रिशूल और ऊपर उठा देते हैं , तब काशी स्वर्ग में चली जाती है।

जब प्रलय की समाप्ति होती है, तो त्रिशूल को शंकर जी नीचे करते जाते हैं, वह काशी पूर्ववत् भूखण्ड पर स्थित हो जाती है।

इसका नाश न होने के कारण इसे अविनाशी कहा है, चार युगों में इसके अर्धचन्द्राकार, धनुषाकार आदि चार रूप हो जाते हैं ।

२. आधिदैविक काशी —– जो देवताओं को अधीन करके स्थित है, वह शंकर जी का महाकैलाश, शिवलोक आदि आधिदैविक काशी है ।

३. आध्यात्मिक काशी ——- शरीर की अनेक नाड़ियों में इड़ा, पिङ्गला, सुषुम्ना — तीन नाड़ियां प्रधान है।

दाहिनी नासिका से निकलने वाली वायु पिङ्गला, बायें से निकलने वाली इड़ा — इन्हें गङ्गा-जमुना के नाम से कहते हैं तथा सूर्य-चन्द्र नाड़ी भी कहते हैं।

बीच की नाड़ी सुषुम्ना ; जिसे सरस्वती भी कहते हैं, इन दोनों का बीच की नाड़ी में संगम होता है, वही आध्यात्मिक काशी है अथवा इसको वाराणसी के नाम से भी कहते हैं ।

क्योंकि बायीं नाड़ी जीव के समस्त पापों को दूर करती है , इसे वरणा कहा है तथा दायीं नाड़ी जीव के समस्त पापों को भस्म करने के कारण नासी है ।

जो साधक दोनों को भस्म करके भृकुटि में स्थित करके शरीर त्यागता है, वह पुनर्जन्म से रहित हो जाता है ।
उपनिषद् में भी कहा है ~~~~

“जन्मान्तरकृतान् सर्वान् दोषान् वारयति तेन वरणा भवति इति।
सर्वानिन्द्रिय कृतान् पापान् नाशयति इति नासी भवति।
इति वरणां नाश्यां च मध्ये प्रतिष्ठिता इति वारणसी।”

इसे वाराणसी क्यों कहते हैं ? जीव के जन्म-जन्मान्तरों के सभी दोषों को दूर करती है, इसीलिए वरणा तथा असी दोनों के बीच में स्थित होने के कारण इसे वाराणसी कहते हैं।

परन्तु इस घोर कलिकाल में साधक के पास इतना विवेक- वैराग्य- योग- ध्यान आदि नहीं है , इसीलिए भगवान् शंकर जीवों का कल्याण करने के लिए काशी वास करते हुए मरने वाले पुरुषों के दाहिने कान तथा स्त्रियों के बायें कान में राम भक्तों को राम तारक मन्त्र , गणेश भक्तों को गणेश तारक , शक्ति के उपासकों को दुर्गा तारक मन्त्र तथा यतियों को प्रणव का उपदेश करके मुक्ति देते हैं ।

भगवान् शंकर के काशी में आने से पहले , काशी देवी साक्षात् तारक मन्त्र का उपदेश देकर जीवों को मुक्त करती थी , इसका विस्तार से उल्लेख ‘ब्रह्मवैवर्त पुराण’ के परिशिष्ट “काशी रहस्य” , ‘स्कन्द पुराण’ के “काशी खण्ड” , “काशी-केदार-महात्म्य” तथा ‘सुरेश्वराचार्य’ कृत “काशी-मोक्ष-निर्णय” आदि ग्रन्थों में किया गया है।

कुछ लोग शंका करते हैं कि सभी सैद्धान्तिक ग्रन्थों में तो “ऋते ज्ञानान्मुक्ति:” , “ज्ञानादेव कैवल्यम् प्राप्यते येन मुच्यते” इत्यादि अनेकों ग्रन्थों में ज्ञान के बिना मुक्ति नहीं है —- ऐसा कहा है , फिर काशी में मरने से मुक्ति कैसे हो सकती है ?

तो इसका उत्तर है —- सत्य ही है कि बिना ज्ञान के मुक्ति कहीं नहीं हो सकती।

काशी में मरने वाले प्रत्येक जीव का कान, स्त्रियों का बायां तथा पुरुषों का दायां , ऊपर रहता है।

उस जीव के शरीर त्यागने से पूर्व भगवान् शंकर त्रिशूल , डमरू आदि धारण किये हुए , उसके समीप जाते हैं।

अधिकारी भक्तों ने दर्शन भी किया है ! उनके पहुँचते ही उस जीव को दिव्य शरीर प्राप्त होता है।

उसको ज्ञानोपदेश करते हुए भगवान् शंकर कहते हैं —

“न मैं हूँ न तुम हो, न काशी है, न गङ्गा है , ब्रह्मा-विष्णु आदि देवता व असुर आदि कुछ भी नहीं है।”

तब भक्त पूछता है —— “यह सब तो मुझे प्रत्यक्ष दिखाई देता है, आप कैसे कहते हो कि कुछ भी नहीं है ?”

उत्तर में शिवजी कहते हैं —- “जगत् स्वप्न के समान मिथ्या है। चेतन का विवर्त है। अर्थात् ब्रह्म ही जगत् के रूप में न होने पर भी जीवों के अज्ञान से इस रूप में भासता है।”

 

“काशी-रहस्य” में कथा है कि एक बार ऋषियों ने भगवान् विष्णु से कहा —— “हमें गङ्गा-जल के ऊपर छत्र के समान एक प्रकाश-पुंज दिखाई देता है ।

इस समय पृथ्वी जल-मग्न है , कोई बचा नहीं है ।”

तब भगवान् विष्णु ने कहा —– “जब मैंने लोक-रक्षणार्थ शंकर जी का स्मरण किया , तो वे प्रभु लिङ्ग-रूप धारण करके मेरे हृदय से बाहर आये तथा बढ़ते-बढ़ते पांच कोश के हो गये ।

वही छत्राकार परम्-ज्योति आकाश में दिखाई देती है , यह पाताल से लेकर वैकुण्ठ तक व्याप्त है , इसी को वेदों में काशी कहा गया है ।

चार युगों में इसका रूप बदलता है , सत्ययुग में छत्राकार , त्रेता में दण्डाकार , द्वापर में लिङ्गाकार व किसी-किसी द्वापर में शंखाकार तथा कलियुग में अर्धचन्द्राकार होती है ।

यद्यपि चर्म-चक्षुओं से काशी का पत्थर एवं मिट्टी का भौतिक रूप दिखता है , परन्तु दिव्य-दृष्टि से अथवा अन्तःकरण की अंतर्मुखी ऋतम्भरा प्रज्ञा से देखने पर प्राचीन ऋषियों के समान आधुनिक भगवत्-भक्तों तथा योगियों को भी श्री काशी जी का चिन्मय-रूप प्रकाशित होता है ।

प्रलय में भौतिक-काशी पृथ्वी , पर्वतों के साथ जल में डूब जाती है तथा चिन्मय-काशी योग-दृष्टि से दिखाई देती है —- यह उत्तर भगवान् विष्णु ने ऋषियों को दिया ।

अर्वाचीन सन्त श्रीरामकृष्ण परमहंस को काशी का दिव्य-शरीर दिखाई दिया । रोलिण्ड ने उनके जीवन-चरित्र में लिखा है :——

“He visited banaras seed out built on stone’s but a condense mass of spirituality. This has also been the experience of other yogies who have visited grand kashi. (Life of the ram krishn paramhans by Mr. Romin roland)

इसका अर्थ है —- “जब स्वामी रामकृष्ण परमहंस जी ने काशी में प्रवेश किया , तब उन्होंने पत्थर की बनी काशी नहीं देखी अपितु अध्यात्म-काशी का प्रत्यक्ष किया ; इसी प्रकार का अनुभव अन्य योगियों को हुआ , जिन्होंने काशी में प्रवेश किया ।”

आद्य जगद्गुरु भगवान् शंकराचार्य जी ने भी “काशी-पञ्चकम्” में कहा है —–

“काश्यां हि काशते काशी काशी सर्वप्रकाशिका ।
सा काशी विदिता येन तेन प्राप्ता हि काशिका ।।”

अर्थात् शरीर को प्रकाशित करने वाली काशी है , इस आध्यात्मिक-काशी (आत्मा) को जिसने जाना , उसने ही काशी को प्राप्त किया ।

शिवपुराण में भी आता है कि भगवान् शंकर ने जब देखा कि मेरी माया से मोहित जीव मुझे नहीं प्राप्त कर सकता , तब उन्होंने त्रिशूल पर टँगी हुई काशी अर्थात् भक्ति-ज्ञान-वैराग्य की त्रिशूल पर टँगी हुई काशी को मृत्यु-लोक में स्थापित किया । यह दिव्य काशी जीवों के सञ्चित कर्मों को भस्म करती है , इसीलिए इसे काशी कहते हैं ।

कभी-कभी संसार में देखा जाता है कि पुण्य-कर्म करने वाले तो बाहर मरते हैं पर पापी काशी में , ऐसा क्यों होता है ?

ऐसी शंका होनेपर समाधान यह है कि इस विषय पर सूक्ष्म-विचार करना चाहिए कि कौन पापी है और कौन धर्मात्मा है !

जो इस जन्म में धर्मात्मा दिखता है , उसे हम धर्मात्मा कहते हैं और जो पापी दिखता है उसके इस जन्म के पाप को देखते हैं ।

अच्छा , इस जन्म में भी किसीके मन में पुण्य है या पाप , यह दूसरा व्यक्ति नहीं जान सकता , यदि किसी ने साधन से जान भी लिया तो इस जन्म का जाना , पिछले जन्म का नहीं , क्योंकि जीव में सीमित सर्वज्ञता है ।

किन्तु ईश्वर में असीमित सर्वज्ञता है , वह सबके अनन्त-जन्मों के पुण्य-पापों को जानता है । अतः पापी के भी सञ्चित पुण्यों के अनुसार काशी में मुक्ति होती है , पिछले सञ्चित पापों के कारण धर्मात्मा की काशी के बाहर मृत्यु होती है ।

जैसे अग्नि में जलाने की शक्ति है , वैसे ही काशी में मोक्षदायिनी शक्ति है ।

जैसे स्वाति नक्षत्र की जितनी बूंदे सीपी में गिरती है , उतने ही मोती बनते हैं , वैसे ही जितने भी काशी में शरीर त्यागते हैं , मुक्ति पाते हैं ।

पञ्च-कोशी काशी में सुईं के नोक के बराबर भी ऐसा स्थान नहीं है , जहां मरने से मुक्ति न होती हो ।

 

काशी-काशी शिव: शिव: ===

“काशी-रहस्य” में भगवान् शिव माता पार्वती से कहते हैं~

“योगोऽत्र निद्रा कृतभ: प्रचार:
स्वेच्छाशनं देवि महानिवेद्यम् ।
लीलात्मनो देवि पवित्र दानम् ,
जप: प्रजल्पं शयनं प्रणाम: ।।”

अर्थात् = हे देवी ! काशी में निद्रा योगनिद्रा है , काशी में चलना योग की खेचरी मुद्रा है , काशी में स्वेच्छा से किया गया भोजन भी नैवेद्य है , अपनी लीला ही पवित्र दान है , बातचीत ही जप है , सोना – बैठना प्रणाम की तरह फलदायी है ।

अतः मुक्ति को दुर्लभ समझ कर पत्थर से अपने पैर तोड़कर काशी में पड़ा रहे ।

काशीपति भगवान् शिव के आश्रित होना ही जन्म – मरण से छूटना है । जिसने अपने कान से दों अक्षरों वाला “काशी” मन्त्र सुना , फिर वह लौटकर संसार में नहीं आता ।

“शिव: काशी शिव: काशी काशीकाशी शिव: शिव: ।
त्रिवारं य: पठेन्नित्यं काशी वास फलं लभेत् ।।”

इस मन्त्र का नित्य पाठ करने से कोई कहीं भी रहे , उसे काशी-वास का फल प्राप्त होता है अथवा तीन दिन काशी-वास करके इस मन्त्र का जप करने वाला कहीं भी मरे , उन्हें काशी में मृत्यु का फल प्राप्त होता है ।

सभी ऊसरों में काशी महान ऊसर है , जैसे ऊसर में बोया बीज नहीं उगता , वैसे ही काशी में शुभाशुभमिश्रित-कर्म रूपी बीज पुनर्जन्म रूपी फल नहीं देता ।

सूर्यवंशी राजा मान्धाता प्रतिदिन अयोध्या से हिमालय जाकर भगवान् शंकर की आराधना करते थे ।

बिना दर्शन किये अन्न-जल नहीं लेते थे , किन्तु जब वृद्ध हो गये , तब शिवजी को काशी में ले जाने के लिए घोर तप किया ।

उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान् शंकर ने वर मांगने को कहा , तब उन्होंने शिवजी से काशी जाने की प्रार्थना की ।

शिवजी ने कहा —- “तुम्हारी इच्छा से मैं १ कला से यहां रहूंगा , १५ कलाओं से काशी-वास करूँगा ; जिससे बाल- वृद्ध- रोगी- निर्धन सबका कल्याण होगा तथा काशी-केदारखण्ड में मरने वाले महापापियों को भैरवी- यातना से मुक्त करूँगा ।”

तबसे केदारखण्ड में मरने वाले महादुष्टों को भी भगवान् बिना भैरवी यातना के मुक्त करते हैं ।

जैसे कोई व्यभिचारी स्त्री या पुरूष को कोई रोग हो जाये , तो उपचार के लिए चिकित्सक के पास जाने पर चिकित्सक उन्हें डांटता नहीं है , किन्तु हर प्रकार से सहानुभूति देता है ।

वैसे ही जन्म-मरण रूपी महारोग के चिकित्सक भगवान् शंकर केदारखण्ड में मरने वालों को मुक्त करते हैं, उनके दोष नहीं देखते ।

काशी-वास करने वालों को भावना करनी चाहिए कि भगवान् शिव पिता तथा पार्वती माता हैं , गङ्गाजी मौसी हैं , ढुंडीराज गणेश जी युवराज हैं , वहां के कोतवाल भैरव मेरे बड़े भाई हैं , मणिकर्णिका बहन हैं , मेरी बुद्धि ही मेरी पत्नी है , सत्कर्म रूपी पुत्र एवं पुत्री है, काशी के निवासी सभी पशु-पक्षी , जीव-जन्तु मेरे परिजन ही है —– ऐसे भावना करने वाले का अवश्य ही कल्याण होता है ।

–अजेश स्वरूप ब्रह्मचारी

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