पञ्च मकार क्या है ?

पञ्च मकार क्या है ? अवश्य पढ़ें गूढ़ हिंदू दर्शन की यह सरल, परन्तु गहरी व्याख्या…

– श्रद्धेय ब्रह्मलीन श्री अरुण कुमार शर्मा जी की लेखनी से उद्घत 💐

प्रायः हम-आप और साधारण जन तांत्रिक साधना प्रसंग चलने पर कुछ अलग ही अनुभव करने लगते हैं। तंत्र का नाम सुनते ही जादू-टोना, काला जादू, झाड़-फूँक, खोपड़ी, मुर्दा, नारी , श्मशान, बलि, आदि के विचार स्वतः ही मस्तिष्क में आने लगते हैं और मन अजीब-सी अरुचि से भर जाता है। दर असल यह सब विचार या धारणा तन्त्र के बारे में समाज में फैले हुए हुए नाना प्रकार के भ्रम के परिणाम स्वरुप है।

तंत्र के कौलमत के आरम्भ काल से ही प्रायः ‘पञ्चमकार’ या ‘मादितत्व’, ‘कुमारी-पूजन’ और ‘योनिपूजा’ का वर्णन और प्रचलन चर्चा का विषय रहा है जिस कारण तंत्र के विषय में तरह-तरह की भ्रांतियां समाज में फ़ैल गईं और तभी से जन-साधारण के मन में तंत्र के प्रति घृणा और नफ़रत की भावना घर कर गयी।

वास्तव में यदि देखा जाय तो ऐसा नहीं है। तंत्र एक उच्चकोटि की विद्या है , एक प्रकृष्ट विज्ञान है जिसे कुछ भ्रष्ट और स्वार्थी तांत्रिकों ने अपने निहित स्वार्थ के चलते बदनाम कर दिया है। आइये, हम लोग इस तंत्र की वास्तविकता और उसमें आये हुए ‘पञ्च मकार'(मद्य, मांस, मत्स्य, मुद्रा और मैथुन) का वास्तविक आशय समझने का प्रयास करें। लेकिन इस पञ्च मकार और उससे जुड़ी हुई सभी बातें और वस्तुएं जानने से पहले तांत्रिक साधना में प्रचलित ‘कौलमत’ को भी जानने की चेष्टा करें।)

 

 

मनुष्य के भीतर छिपी हुई रहस्यमयी अलौकिक शक्तियां क्या हैं, उनका मूल स्रोत क्या है ?–इसे जानना आवश्यक है। योग-तंत्र की जितनी भी साधनाएं हैं, वे सब उन्हीं पर आधारित हैं। योग-तंत्र का आश्रय लेकर मनुष्य को उसके शरीर में स्थित उन अव्यक्त शक्तियों का साक्षात्कार करा देना ही भारतीय संस्कृति का चरम लक्ष्य है। जो मनुष्य मानव शरीर ग्रहण कर इस लक्ष्य को प्राप्त न कर सका तो सच जानिए उसका जीवन समस्त भौतिक सुखों के बाद भी व्यर्थ चला गया।

इस चरम लक्ष्य को पाना वास्तव में परम पुरुषार्थ है और इस पुरुषार्थ का एक मात्र माध्यम है–मनुष्य।

योग-तन्त्र एक प्रकृष्ट विज्ञान है और इस विज्ञान के अनुसार संपूर्ण ब्रह्माण्ड के मूल में केवल एक तत्व है जिसे ‘परमतत्व’ कहते हैं। सृष्टि के प्राक्काल में वही ‘परमतत्व’ दो भागों में विभक्त होकर ‘शिव’ और ‘शक्ति’ के रूप में जाना गया।

‘शिव’ क्या है, ‘शक्ति’ क्या है ?–यदि वैज्ञानिक दृष्टि से इस पर विचार करें तो ये दोनों ही ब्रह्मांडीय मौलिक ऊर्जा से संबद्ध हैं। एक है विधायिका शक्ति और दूसरी है निषेधात्मिका शक्ति। दोनों का मूल स्रोत वास्तव में वह ‘परमतत्व’ है।

पुरुष परमेश्वर है तो प्रकृति परमेश्वरी है। शिव कामेश्वर है तो शक्ति कामेश्वरी है। सभी पुरुष परमेश्वर और सभी स्त्रियां परमेश्वरी हैं और हैं कामेश्वर और कामेश्वरी। इन दोनों का मिथुनात्मक सम्बन्ध ही मूल है। वही मूल आकर्षण है या काम है।

कौल मत की आध्यात्मिक भावना अत्यन्त गहरी और सूक्ष्म है–इसमें कोई संदेह नही। जैसे ‘शिव’ और ‘शक्ति’ के संयोग से सृष्टि हुई है, वैसी ही यदि देखा जाय तो ‘शब्द’ और ‘अर्थ’ की भी उत्पत्ति हुई है और निवृत्तिशक्ति और प्रवृत्तिशक्ति भी निष्पन्न हुई है।

शब्द की निष्पत्ति और जप को भी मैथुन की संज्ञा से स्पष्ट किया गया है। जप करने वाले साधक को जप करते समय अपने दोनों होंठों का सहयोग लेना पड़ता है। जहाँ युगल या मिथुन का आपस में व्यापार होता है तो दोनों के उस क्रिया-व्यापार को मैथुन की संज्ञा दी गयी है।

जप नीचे और ऊपर दोनों होंठों के मिथुनात्मक संयोग का फल है। नीचे का होंठ शक्ति और ऊपर का होंठ शिव की ओर संकेत करता है। होठों का मिथुनात्मक रूप जप में हिलना ही मैथुन है और उससे निकलने वाला शब्द ‘बिन्दुश्वरूप’ है।

 

कौलमत ने ही सबसे पहले यह बतलाया कि मानव शरीर ब्रह्माण्ड का संक्षिप्त संस्करण है–

‘ब्रह्माण्डे$प्यस्ति यत्किंचित् पिण्डे$प्यस्ति सर्वथा।’

ब्रह्माण्ड की प्रत्येक वस्तु किसी न किसी रूप में मानव पिण्ड में विद्यमान है। इसीलिये मानव शरीर को दुर्लभ बतलाया गया है।

पञ्चतत्वों से निर्मित मानव शरीर में तीन तत्व सबसे अधिक मूल्यवान हैं–‘प्राणतत्व’, ‘मनस्तत्व’ और ‘बिन्दुतत्व’। ये तीन तत्व कौल मतावलंबियों की समस्त योग-तांत्रिक साधनाओं के आधार हैं। मानव शरीर की श्रेष्ठता स्वीकार करने के कारण अपने देश के इतिहास में कौल साधना किसी समय अपनी चरम सीमा पर थी।

अखिल ब्रह्माण्ड में व्याप्त वह ‘परमतत्व’ अपनी सर्वश्रेष्ठ लीलाएं मानव शरीर का ही आश्रय लेकर प्रकट करता है। विष्णु के अनेक अवतार हुए लेकिन जो अवतार सबसे अधिक मानवीय हैं –राम, कृष्ण और बुद्ध, उन्हीं का आश्रय लेकर हमारे देश की धर्मसाधना और काव्यकला विकसित हुई।

तत्ववेत्ता ऋषियों ने अपने अनुभव के आधार पर भगवान्, ईश्वर्, परमात्मा या परमेश्वर के विषय में हमें बहुत कुछ स्पष्ट दिशा दी है। उनका कहना है कि उस भगवान् को बाहर खोजने की आवश्यकता नहीं है। उसका वास्तविक निवास तो एकमात्र मानव शरीर है।

कौल मत की इस धारणा को और अधिक बल उस समय मिला जब परमतत्व के दो रूप ‘अहम्’ और ‘इदम्’ की कल्पना ‘शिव’ और ‘शक्ति’ या ‘पुरुष’ और ‘प्रकृति’ के रूप में की गयी और यह बतलाया गया कि मानव शरीर के दो हिस्से हैं। कंठ स्थान से ऊपर का हिस्सा ‘ज्ञानखण्ड’ और नीचे का हिस्सा ‘कर्मखण्ड’ है।

ज्ञानखण्ड में ज्ञानेन्द्रियाँ और कर्मखण्ड में कर्मेन्द्रियाँ हैं। ज्ञानखण्ड का मूलकेंद्र सहस्रार चक्र है और कर्मखण्ड का मूलकेंद्र है–मूलाधार चक्र। सहस्रार चक्र में शिव का वास है और मूलाधार चक्र में वास है शक्ति का। पहला परमेश्वर है और दूसरी परमेश्वरी है।

इसी प्रसंग में कौलमत ने यह भी स्पष्ट किया कि मूलाधार चक्र में बाल से भी पतला गोलाकार घूमा हुआ एक नाड़ी तन्तु है, उसी नाड़ीतन्तु में वह महा जीवनीशक्ति पराशक्ति ‘कुण्डलिनी’ सुप्तावस्था में विद्यमान है। तन्तु का रूप सर्पिणी के कुंडली के समान होने के कारण कौलमत ने उस शक्ति को नाम् दिया–कुण्डलिनी शक्ति’।

सनातन काल से ही इस देश में तंत्र ज्ञान, कर्म और उपासना का स्रोत समझा जाता रहा है। देश, काल, समाज और मानव संस्कृति से बराबर प्रभावित होने वाली तांत्रिक परम्परा अत्यन्त उन्नत स्थिति को प्राप्त हुई–इसमें सन्देह नहीं। तंत्रों के बारे में जो अनेक भ्रम और गलत धारणाएं फैली हुई हैं, उनमें तंत्र-परम्परा का दोष नहीं है, वरन उन तांत्रिकों का दोष है जो बिना आस्था और श्रद्धा के ही तांत्रिक बन गए।

तंत्र के प्रति अज्ञानता का लाभ उठाकर ऐसे लोग जन-साधारण की दुर्बलता से तन्त्र-मन्त्र के नाम पर फायदा उठाने का प्रयत्न करते रहे हैं। ऐसे ही लोगों के द्वारा तंत्र की पूजा-पाठ की आड़ में व्यभिचार, भ्रष्टाचार को प्रोत्साहन दिया गया।

जन-मानस में इसका गंभीर प्रभाव पड़ा। लोगों ने यह समझ लिया कि तांत्रिक क्रियाओं और उपासनाओं के नाम पर वासना की तृप्ति ही मात्र तन्त्र का उद्देश्य है। रतिक्रिया, मदिरापान आदि की तुष्टि का एकमात्र साधन है–तांत्रिक साधना। लेकिन यह धारणा अब धीरे-धीरे कम होती जा रही है।

तांत्रिक साधना में जिन गोपनीय क्रियाओं और सामग्रियों के उपयोग की अनुमति विशेष् परिस्थिति में दे रखी है–उनका दुरुपयोग हुआ है। लेकिन उससे तन्त्र और उसकी साधना कदापि दूषित नहीं हो सकती। तांत्रिक साधना अत्यन्त गम्भीर और उच्च आध्यात्मिक साधना है।

तन्त्र शब्द की व्युत्पत्ति ‘तनु’ धातु से हुई है जिसका अर्थ है–विस्तार करना– ‘तनोति विस्तारयति ज्ञानं येन यस्मात् वा तत् तन्त्रम्।’ अथवा–‘तन्यते विस्तारयते ज्ञानं अनेन इति तन्त्रम्।’ अर्थात्–जिसके द्वारा ज्ञान का विस्तार हो, उसे तंत्र कहते हैं।

तंत्र ज्ञान का विस्तार तो करता ही है, साथ ही साथ यह रक्षा भी करता है। इससे यह स्पष्ट है कि तन्त्र साधक को आदिभौतिक, आदिदैविक और आध्यात्मिक– तीनों प्रकार के तापों से मुक्ति दिलाता है। वह भय मुक्त करता है।

प्राचीन काल से ही अनेक देवगण तांत्रिक साधना के पथिक रहे हैं। शक्ति-साधना उनका आदर्श रहा है जिसका लक्ष्य है–महाशक्ति जगदम्बा की मातृरूप में उपासना। ब्रह्मा, विष्णु, इंद्र, चंद्र, स्कन्द, वीरभद्र, लक्ष्मीश्वर, कामेश्वर, मन्मथ–ये सब श्रीमाता के उपासक थे।

प्रसिद्ध ऋषियों में कोई कोई तांत्रिक मार्ग के उपासक थे और कोई कोई तो तांत्रिक मार्ग के प्रवर्तक भी थे। उनमें वृहस्पति, दधीचि, सनतकुमार, उशना, नकुमीश आदि का वर्णन आया है। जो प्रवर्तक ऋषि थे, उनमें दुर्वासा, गौतम, याज्ञवल्क्य, भृगु, कात्यायन, गालब, शातातप, आपस्तम्ब, सनक, विष्णुकश्यप, संवर्तविश्वामित्र आदि थे।

तंत्रविज्ञान में कौलमत का मुख्य लक्ष्य है–अद्वैत लाभ जिसका आशय है–जीवभाव से मुक्ति और परम निर्वाण, जो शरीर में स्थित शिव और शक्ति के मिलन से ही सम्भव है। यहाँ जिस मिलन या योग की बात की गयी है, वह है–कुण्डलिनी योग।

समस्त योगों में यही एकमात्र योग है जो तंत्र के गुह्य आयामों पर आधारित है। इसीलये इसे महायोग कहा गया है। यह कहना अतिश्योक्ति न होगी कि जहाँ पातंजल योग समाप्त होता है, वहां से कुण्डलिनी योग आरम्भ होता है।

कुण्डलिनी योग साधना के मुख्य चार चरण हैं। प्रथम चरण में कुण्डलिनी जागरण, दूसरे चरण में उसका उत्थान, तीसरे चरण में क्रमशः चक्र भेदन और चौथे चरण में सहस्रार स्थित शिव के साथ शक्ति का ‘सामरस्य महामिलन’। इन चारों चरणों की साधना योगतंत्र की बाह्य और आतंरिक क्रियाओं द्वारा संपन्न होती हैं।

 

कौलमत मुख्यतया दो भागों में विभक्त है–पूर्वकौल और उत्तरकौल। पूर्वकौल समायाचारी साधना मार्ग है और उत्तरकौल है वामाचारी साधनामार्ग। दोनों मार्गों में शक्ति की प्रतीक ‘योनि’ की पूजा है।

कौलमतावलम्बियों का कहना है –‘योनिपूजा बिना पूजा कृतमप्यकृतं भवेत्।’ अर्थात्–योनिपूजा के बिना की गयी कोई भी पूजा, पूजा ही नहीं है।

लेकिन पूर्वकौल मतावलम्बी और अनुयायी श्रीयंत्र योनि की पूजा करते हैं। उत्तरकौल के मत के अनुयायी प्रत्यक्ष योनि के उपासक होते हैं। दोनों मार्ग की साधना का आधार ‘पञ्चमकार’ है। पहले में वह प्रतीक रूप में है और दूसरे में है प्रत्यक्ष रूप में।

वामाचारी साधनामार्ग अत्यन्त कठिन है और दुरूह है। इस पर चलना सभी के वश की बात नहीं है। ‘वामा’ का अर्थ है–स्त्री। इस मार्ग की जितनी भी साधनाएं हैं, सबका आधार है स्त्री। इसलिए इसे ‘वामाचार’ की संज्ञा दी गयी है।

साधना की दृष्टि से स्त्री के साथ जो आचरण किया जाता है, वह है–‘वामाचार’। इसी लिये कहा गया है–‘वामा $$चारः परमगहनो योगिनामप्यगम्य:।’ यह मार्ग स्पष्ट रूप से कहता है –‘सर्वधर्मान् परित्यज्योनिपूजारतो भवेत्।’

स्त्री कोई भी जाति या धर्म की हो, वह योगतांत्रिक दीक्षा से साधक की साधना के योग्य हो जाती है–‘दीक्षामात्रेण शुद्ध्यन्ति स्त्रियः सर्वत्र कर्मणि।’

यदि विचार पूर्वक देखा जाय तो वामाचारी साधना मार्ग प्रवृत्ति से निवृत्ति की ओर ले जाता है। बाह्य क्रियाओं का सहारा लेकर यह साधना की आतंरिक भूमि में प्रवेश कराता है। कर्मयोग, ज्ञानयोग, भक्तियोग, राजयोग, सातत्ययोग आदि जितने भी योग हैं, उन सबका ‘कुण्डलिनी योग’ में समावेश है। कुण्डलिनी जागरण का अभ्यास सद्गुरु के सानिध्य और निर्देशन में ही सम्भव है।

कौलाचार—

इसका रहस्य अत्यन्त गूढ़ है। ‘कौल’ कुल शब्द से बना हुआ है। ‘कुल’ का अर्थ है–कुण्डलिनी शक्ति। तथा ‘अकुल’ का अर्थ है–‘शिव’। जो व्यक्ति योगविद्या के सहारे कुण्डलिनी का उत्थान कर सहस्रार में स्थित ‘शिव’ के साथ संयोग करा देता है, उसे ही ‘कौल’ कहते हैं।

कुलाचार—

कुण्डलिनी शक्ति ही कुलाचार का मूल आलम्बन है। कुण्डलिनी के साथ जो आचार किया जाता है, उसको ‘कुलाचार’ कहते हैं। यह आचार मद्य, मांस, मीन, मुद्रा और मैथुन–इन पञ्च मकारों के सहयोग से अनुष्ठित होता है। पंचमकार का रहस्य नितान्त गूढ़ है। उसे ठीक-ठीक न जानने के कारण लोगों में अनेक प्रकार की भ्रांतियां फैली हुई हैं। इन पांचों मकारों का सम्बन्ध अंतर्योग से है।

‘कुलाचार’ ही ‘कौलाचार’ या ‘वामाचार’ के नाम से प्रसिद्ध है। पंचतत्व को मुद्रा समझना चाहिये। वास्तव में ये पञ्चमकार योगी की पञ्चमुद्रा हैं जो उसे मुक्ति देने वाले हैं–

‘मद्यम् मासं व मीनं च मुद्रा मैथुनमेव च।
मकारपंचकं प्राहुर्योगिन: मुक्ति दायिकम्।।’
अर्थात्–मदिरा, मांस, मछली, मुद्रा और मैथुन–ये पंचमकार योगी को मुक्ति देने वाले कहे गए हैं।

पंचमकार का यौगिक रूप–

अनेक प्राचीन तांत्रिक ग्रन्थों के अनुसार वशिष्ठ ने अनार्य तंत्रों से प्रभावित होकर पंचमकार की विशिष्ट पद्धति का प्रचार किया था। सम्भव है कि अर्वाचीन कौलमार्गी अनार्यों से प्रभावित होकर इन पंचमकारों को अपनी उपासना के साधन माने हों।

लेकिन बहुत से तांत्रिक अनुशीलनकर्ताओं ने अपने अनुसन्धान के आधार पर यह मत स्थापित किया है कि ये उक्त पंचमकार वैदिक अनुष्ठानों से ही अनुस्यूत हैं। जिनमें पांच ऐसे तत्वों की गणना है जिनका प्रथम अक्षर ‘म’ है और इसीलिये इन्हें ‘मादितत्व’ भी कहा जाता है। कौलाचार के मूल ग्रन्थ ‘कुलार्णवतंत्र’ में इन पांचों को समझाया गया है–

‘मद्यम् मासं च मत्स्यम च मुद्रा मैथुनमेव च्।
मकारपंचमं देवि देवता प्रीतिकारकम्।।’

अर्थात्–हे देवि ! मदिरा, मांस, मछली, मुद्रा और मैथुन –ये पांचों देवता को प्रसन्न करने वाले कारक हैं। ये उपासना के लिए परम आवश्यक हैं। यदि इनके बिना कोई साधना करता है तो उसकी साधना निष्फल जाती है।

श्रीविद्या के उपासक ‘समयाचार’ के मतावलंबी साधक इन पांचों तत्वों का प्रत्यक्ष प्रयोग न कर उनकी कल्पना कर लेते हैं अथवा उनके स्थान पर वे किसी अन्य वस्तु का प्रयोग प्रतीक के रूप में करते हैं। जैसे–मांस के स्थान पर जवाफूल आदि।

परन्तु कौलमत में इनके प्रयोग को लेकर दो मत चल पड़े हैं–पूर्वकौल और उत्तरकौल। पूर्वकौल के अनुसार श्रीचक्र के भीतर स्थित योनि की पूजा की जाती है। जबकि उत्तरकौल के अनुसार इनका सबका प्रत्यक्ष प्रयोग किया जाता है।

क्या सच में पञ्च मकारों जैसे भौतिक तत्वों का प्रयोग साधना में करना चाहिए ? क्या ऐसा करना उचित है ?–इस प्रश्न पर विचार करने की आवश्यकता है। यदि ये पांचों ‘मादितत्व’ भौतिक ही हैं तो इनके प्रत्येक के साथ ‘गोपनीय’ और ‘रहस्यमय’ शब्द क्यों लगाये गए हैं और यदि इनका अर्थ सामान्य अर्थ में किया गया है तो इस मार्ग पर चलना अत्यन्त कठिन क्यों कहा गया है ? आइये ‘कुलार्णव तंत्र’ में देखें क्या कहा गया है इस सम्बन्ध में ?–

मद्य पानेन मनुजो यदि सिद्धिम् लभेत् वै।
मद्यपानरताः सर्वे सिद्धिं गच्छन्तु पामराः।।
मासं भक्षणमात्रेण यदि पुण्यागतिर्भवेत् ।
लोके मासाशिनः सर्वे पुण्यभाजो भवन्ति हि।।
स्त्रीसंभोगेन देवेशि यदि मोक्षो भवेत् हि।
सर्वे$पि जंतवो लोकेक मुक्ता: स्यु: स्त्रीनिषेवनात्।।

अर्थात्–यदि मदिरा पान करने से मनुष्य को सिद्धि प्राप्त होने लगे तो फिर मदिरा सेवन करने वाले सभी गवांर सिद्धि को प्राप्त कर ही लेंगे। यदि मांस भक्षण करने से ही लोगों की पुण्यगति हो जाये तो इस लोक में सभी मांसाहारी पुण्य के भागी हो जायेंगे। इसी प्रकार से स्त्री के साथ सम्भोग क्रिया करने से किसीको भी मोक्ष प्राप्त होता हो तो इस संसार में कोई ऐसा जीव या प्राणी नहीं रहेगा जिसको मोक्ष उपलब्ध् न हो जाये।

इस प्रकार ‘कुलार्णव तंत्र’ में स्पष्ट उल्लेख होने के कारण हमें यह मानना पड़ेगा ये पञ्च मकार कोई भौतिक तत्व न होकर किसी आतंरिक तथ्य की ओर संकेत करते हैं। ये आतंरिक तथ्य पूर्णतया यौगिक और रहस्यमय हैं।

मद्य(मदिरा)–

इन पञ्च मकारों में सबसे पहले ‘मद्य’ का नाम् आता है जो साधारण मदिरा न होकर उससे करोड़ों गुना अधिक आनंद प्रदान करने वाला होता है। इसमें प्रत्यक्ष मदिरा का कोई स्थान नहीं है।–

सुरादर्शनमात्रेण कुर्यात् सूर्यावलोकनम्।
तत्संधानमात्रेण प्राणायामत्रयं चरेत्।।

अर्थात्–इस मद्य(सुरा) का तात्पर्य ब्रह्मरंध्र में स्थित सहस्रदल कमल से अनवरत नि:स्यन्दमान अमृत से है। इस मद्य के सेवन की बात छोड़िए, मात्र दर्शन से ही सूर्य मण्डल का अवलोकन होता है और इसके सेवन करने से साधक के प्राणों का विस्तार हो जाता है और वह सूर्यलोक में संचरण करने लग जाता है।

इसलिए साधक को इसी सुधारूपी मद्य से अपने पात्र को भरना चाहिए। यह मद्य गुरुकृपा से देवता को प्रसन्न करने के लिए साधक को प्राप्त होता है जिसका पान उसे अविचलित मन से करना चाहिए।

इस मद्य के आनन्द में इच्छाशक्ति पाने में, ज्ञानशक्ति स्वाद में, क्रियाशक्ति उल्लास में पराशक्ति का निवास रहता है। यह मद्य मायाजाल का नाश करता है, मोक्षमार्ग का निरूपण करता है। सभी प्रकार के दुखों का शमन करता है। इस मद्य का पान योगी लोग ही कर सकते हैं।

हमें चाहिए कि ऐसे शराबी का हम उपहास न करें। साथ ही साधक को भी चाहिए कि वह अपने किसी भी चक्र के रहस्यमय आनंद को कभी बाहर प्रकट न करे। संयमी साधक इस चक्र में स्थित होकर अपने कुल देवता का स्मरण करे। इस चक्र में स्थित आनंद का वर्णन कुलार्णव तंत्र करता है–

दिव्यपानरतानां वै यत्सुखम कुलयोगिनाम्।
तत्सुखं सार्वभौमस्य नृपस्यापि न विद्यते।।

अर्थात्– दिव्य मद्यपान करने में रत योगियों का आनंद निश्चय ही चक्रवर्ती सम्राट को भी उपलब्ध् नहीं हो पाता।

तंत्र साहित्य का क्षेत्र बहुत विस्तृत है जिसे मुख्य रूप से तीन भागों में विभक्त किया गया है–विष्णुक्रान्ता, रथक्रान्ता और अश्वक्रान्ता। प्रत्येक के 64 तंत्र हैं।

इन 64 तंत्र के साहित्य की विचारधाराओं को भी तीन अलग-अलग भागों में विभक्त किया जा सकता है–ब्राह्मण तंत्र, बौद्ध तंत्र और जैन तंत्र। ब्राह्मण तंत्र की भी तीन विशिष्ट शाखाएं है–वैष्णवतंत्र, शैवतंत्र और शाक्ततन्त्र।

इन तीनों तंत्रों का विशाल साहित्य उपलब्ध् है। फिर भी यह स्वीकार किया जाता है कि इनमें शाक्त तंत्र सबसे अधिक महत्वपूर्ण है। शाक्त तंत्र में शक्ति की उपासना की जाती है।

करीब दो हज़ार वर्ष पहले तांत्रिक साधना में सिद्धि लाभ के लिए चार मुख्य पीठों की स्थापना हुई–जालंधर पीठ, कामाख्या पीठ, पूर्णागिरि पीठ और उड्डयान पीठ।

पीठ का अर्थ है–शक्ति केंद्र–एक ऐसा शक्ति केंद्र जिसका अगोचर सम्बन्ध दैवीय राज्य और भावराज्य से जुड़ा होता है। इनके विषय में और उनकी महत्ता के बारे में बहुत कुछ लिखा गया है पर् वास्तविक ज्ञान तो गुरुमुख से उनके सान्निध्य में रहकर ही मिलता है लेकिन मुश्किल यह है कि सच्चे गुरु पहले तो मिलते ही नहीं हैं, यदि मिल भी जाएँ तो वे तंत्र के रहस्यों के बारे में चुप ही रहते हैं।

एक ओर तो ये समस्याएं हैं और दूसरी ओर यह भी निस्संदेह सत्य है कि तंत्र और उनकी साधना के नाम पर मदिरा, मांस, मीन, मुद्रा और मैथुन के सेवन का मार्ग चारों ओर प्रशस्त हुआ मिलता है।

आज के तथाकथित तांत्रिक जहाँ देखो , वहां इन पञ्च मकारों के नाम पर समाज में व्यभिचार, पापाचार फैलाते मिल जाते हैं। उन्हें मदिरा और मैथुन आदि का भरपूर आकर्षण यहाँ मिलता है, कुत्सित उद्देश्यों की पूर्ति होती है।

निश्चित ही आज के तथाकथित तांत्रिक इन्ही सबके फलस्वरूप इस ओर झुकते हैं। जगह-जगह पर गुप्त साधना केंद्र बनाकर लोगों को ठगने का तो धन्धा चला ही रहे हैं, साथ ही भोली-भाली स्त्रियों और कन्याओं को भी फंसाकर अपनी काम-पिपासा का शिकार बनाते हैं।
ऐसा लगता है कि इस तरह की साधना पद्धति में ऐसे ही लोगों का हाथ रहा है जो किसी भी दृष्टि से साधक या तांत्रिक नहीं कहे जा सकते। यदि शासन-प्रशासन इस ओर ध्यान दे और इन तथाकथित तांत्रिक साधना केंद्रों की ईमानदारी से कड़ाई से जाँच करे तो यह कहते हुए अतिशयोक्ति नहीं होगी कि इनमें से 95% साधना केंद्र धड़ाधड़ बन्द होने लगेंगे।

इतना ही नहीं, पुलिस की रेड पड़ने के डर से ये तथाकथित दाड़ी और जटा-जूट वाले नकली तांत्रिक नाई की दुकानों पर कतार बद्ध दिखाई देंगे। लेकिन वह दिन शायद अभी निकट भविष्य में आता हुआ दिखाई नहीं देता जब नकली ढोंगी, पाखंडी तांत्रिकों का भंडाफोड़ होगा।

मगर ऐसा ही अभियान आदिगुरु शंकराचार्य ने समाज में सहस्राब्दियों पहले चलाया था और उन्होंने वास्तविक सनातन धर्म और वैदिक धर्म की स्थापना के लिए पूरे भारत वर्ष की पदयात्रा की थी और चार धामों की स्थापना की थी। आज फिर से एक और आदि शंकराचार्य की समाज को महती आवश्यकता है।

तांत्रिक साधना के वास्तविक स्वरूप से लोगों को परिचित कराने की दिशा में कलकत्ता हाई कोर्ट के जज माननीय ‘सर् जॉन उडरफ’ ने ‘आर्थर एवेलन’ के उपनाम से सबसे पहले प्रशंसनीय कार्य किया। उन्होंने अंग्रेजी में अनेक उपयोगी ग्रंथों के प्रकाशन में सहयोग किया।

इसका फल यह हुआ कि जन साधारण के अलावा विद्वानों का भी ध्यान इस ओर आकृष्ट हुआ। फिर अनेक संस्थाएं खुलीं। अनुसन्धान विभाग खुले। तत्कालीन शासन का भी ध्यान इस तरफ गया और पुरातत्व विभाग की स्थापना इसी उद्देश्य को लेकर विशेष् रूप से हुई।

वर्तमान युग में सर् जॉन उड़रफ के अलावा विद्यार्णव, शिवचंद्र महाशय, प्रमथनाथ मुखोपाध्याय आदि का योगदान प्रमुख माना जायेगा। योगदान के इस प्रसंग में महा महिम डॉक्टर गोपीनाथ कविराज का स्मरण करना सूर्य को दीपक दिखाने के समान होगा।

पञ्च मकारों में ‘मद्य'(मदिरा) के विषय में विचार किया जा चुका है। अब दूसरा है–

मांस–

तांत्रिक साधना में ‘मद्य’ की तरह ‘मांस’ का सेवन करने का विधान है। लेकिन यह ‘मांस’ क्या वही मांस है जिसका सेवन आमतौर पर लोग करते हैं ? नहीं, ये मांस अलग है। इसका अर्थ अलग है।

इसका आशय है-प्रिय। कल्याणकारी होने के कारण, अमृत स्वरूप आनन्द प्रदान करने के कारण और सभी देवताओं का प्रिय होने के कारण उसका नाम ‘मांस’ है। क्या ये सारे गुण साधारण मांस में मिलते हैं ?

नहीं, यद्यपि ‘पाशुपत’ मत के अनुसार ‘पशु’ शब्द का अर्थ जीव से लिया गया है, लेकिन यहाँ पशु का अर्थ ‘पाप-पुण्य भाव रूपी पशु’ से लिया गया है। हमारे ह्रदय में जो भी भाव होते हैं, तंत्र उन्हें पशुभाव मानता है। तंत्र में पुण्य और पाप को महत्त्व न देकर भाव रहित अवस्था को श्रेष्ठ माना गया है।

जब तक साधक के मन में पाप या पुण्य के भाव का अस्तित्व है, तब तक वह पशु की श्रेणी में है। ऐसे ही अज्ञानरूपी पशु को ज्ञानरूपी खड्ग से मारकर मांस भक्षण करना मांसाहार के सामान है। कुलार्णव तंत्र में कहा गया है–

पुण्यापुण्ये पशुम् हत्वा ज्ञानखड्गेन योगवित्।
परे शिवे ! नयेच्चितं पलाशी स निगद्यते।।
मनसा चेन्द्रियगणं संयोज्यात्मनि योगवित्।
मांसाशी भवेद देवि ! शेषा: स्यु: प्राषिहिंसकः।।

अर्थात्–हे देवि ! ज्ञानरूपी खड्ग के द्वारा पुण्य और पापरूूपी पशुओं का हनन करने वाला और अपने मन को पर(ब्रह्म) में लीन करने वाला साधक ही वास्तव में मांसाहारी है। केवल वही योग के ज्ञाता साधक मांसाहारी कहे जा सकते हैं जो सभी इंद्रियों का मन के द्वारा संयोजन करके आत्मा में उन्हें प्रविष्ट करा देते हैं।

अज्ञानेन यो हन्त्यादात्मार्थ प्राणिनः प्रिये।
निवसेन्नर के धीरे दिनानि पशुरोमभिः।।

अर्थात्–हे प्रिये !–भगवान् शिव भगवती शक्ति को तन्त्र के रहस्य को समझाते हुए आगे कहते हैं –पूर्णरूपेण अर्थ समझें बिना इन पञ्च मकारों में मांस आदि का भौतिक रूप से सेवन करने वाले साधक बहुत बड़ी भूल करते हैं।

स्वनिमित्तं तृणं वापि छेदयेन्न कदाचन।
आत्मार्थ प्राणिनां हिंसा कदाचिन्नोदिता प्रिये।।

अर्थात्–हे प्रिये ! अपने प्रयोजन के लिए प्राणियों की हिन्सा की बात तो दूर, एक तिनके की नोक से छेदकर भी किसी को कष्ट नहीं देना चाहिए।

जहाँ हमारे तंत्र ग्रंथों में अहिंसा की इतनी उच्च भावना उल्लिखित हो, वहां मांस खाने के लिए पर जीव की हिंसा करने का तो प्रश्न ही नहीं उत्पन्न होता।

फिर ये मद्य, मांस आदि की बात तांत्रिक परंपरा में कहाँ से प्रवेश कर गयी ?

इसका सीधा सा उत्तर है कि जिस प्रकार से महर्षि वशिष्ठ ने अनार्य संस्कृति से प्रेरित होकर तंत्र की विधा को अपनाया था लेकिन उन्होंने अपनी ऋषि परंपरा और उसकी मर्यादा का ध्यान रखकर उसमें आर्य तत्वों का समावेश कर सुधार कर लिया। लेकिन ऐसे कितने वशिष्ठ थे जो आर्य अनुकूल मार्ग पर चले ?

शायद उनके अनेक तांत्रिक समसामयिक साधकों ने उन्हीं अनार्य तांत्रिक क्रियाओं का पालन किया जिसका परिणाम यह सामने आया कि उस समय से दो सामानांतर तांत्रिक धाराएँ समाज में चलनी आरम्भ हो गईं। अच्छाई की तुलना में बुराई शीघ्र फैलती है, इसका भी वही परिणाम हुआ जो बाद के वर्षों में देखा गया।

तांत्रिक अभिचार करने वाले तथाकथित भ्रष्ट और निकृष्ट स्वार्थी तांत्रिकों का बोलबाला समाज में हो गया और तंत्र-मंत्र के नाम पर और उसकी दीक्षा तथा सिद्धि के नाम पर समाज की कन्यायें और स्त्रियां सुरक्षित नहीं रह गईं। लोग तांत्रिकों के नाम से कांपने लगे। लोगों ने अपनी बहू-बेटियों को घर से बाहर जाने देने से इनकार कर दिया।

इसके साथ ही एक बुराई और उतपन्न हो गयी। जन साधारण में उनका इतना आतंक छा गया कि लोग कन्या के नाम से संतान उत्पन्न करने से भी घबराने लगे। कहीं-कहीं तो उसका रूप और भी वीभत्स हो गया। यह कहते हुए बहुत अफ़सोस होता है कि घर में कन्या पैदा होते ही लोग उसको गला दबाकर मारने भी लगे।

आगम

तन्त्र का ही दूसरा नाम ‘आगम’ है। जिससे अभ्युदय, लौकिक कल्याण तथा निःश्रेयस (मोक्ष) के उपायों का प्रतिपादन हो, वह शास्त्र ही ‘आगम’ है।—-

‘आगच्छन्ति बुद्धिमा रोहति यस्मात् अभ्युदय निःश्रेयसोपायाः स आगमः।’

आगम का मुख्य लक्ष्य है साधना और उपदेश। तंत्र के दो रूप हैं–बहिरंग रूप और अंतरंग रूप। बहिरंग साधना के अंतर्गत तंत्र का साधना-उपदेश है। अपने उपदेश के आधार पर क्रिया और अनुष्ठान पर वह अधिक बल देता है। ‘अपरा पूजा’और ‘इष्टोपासना’ इसी के अंतर्गत है।

आगम के सात लक्षण है जिनसे यह बात सिद्ध होती है। ये सात लक्षण निम्न लिखित हैं–सृष्टि, प्रलय, देवार्चन, सर्वसाधन, पुरश्चरण, षट्कर्म और ध्यान। ये सातों लक्षण व्यापक रूप से तंत्र के बहिरंग रूप की ओर संकेत करते हैं। बहिरंग साधना का एकमात्र मुख्य विषय है-मन्त्र, यंत्र और देव प्रतिमा।

इन तीनों की सिद्धि और साधना के मूल में ‘ध्यानयोग’ है। देवता के गुण, कर्म, स्वभाव, स्वरुप के चिन्तन के आधार पर मन्त्रों का ‘उद्धार’ एवम् ‘सिध्दि’ की जाती है तब उन मन्त्रों को यज्ञ से संयोजित कर देवता का ध्यान और उपासना का वर्णन किया जाता है।

तंत्र की विशेषता उसकी ‘क्रिया’ है। अर्थात् तंत्र की बहिरंग साधना और उपासना क्रिया प्रधान है। ज्ञान को क्रिया रूप में न बदलने से वह ज्ञान भार बन जाता है।–

“ज्ञानम् भारः क्रिया बिना।”

ज्ञानसंपन्न साधक जब तक उस ज्ञान को जीवन में परिणत कर उसे क्रियात्मक नहीं बनाता, तबतक वह अपने लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर सकता। तंत्र के जितने लक्ष्य हैं, उनमें एक यह भी है–ज्ञान को कर्म में बदलना और फिर उक्त कर्म को ज्ञान में परिवर्तित करना।

बहिरंग और अंतरंग साधना का संधिकेंद्र है–ध्यान। बहिरंग साधना के भीतर तीन प्रमुख तत्व हैं–शुद्धि, ध्यान और उपलब्धि। बिना शुद्धि के ध्यान की उपलब्धि नहीं, बिना ध्यान के सिद्धि की उपलब्धि नहीं। ध्यान के द्वारा ‘इष्ट’ के प्रति जो कुछ उपलब्ध् होता है, वह बहिरंग साधना की मूल संपत्ति समझी जाती है और उसीके आधार पर अंतरंग साधना का श्रीगणेश होता है।

बहिरंग साधना, उपासना, पूजा आदि जो कुछ है, वह सब ‘अपरा’ है। ध्यान की उपलब्धि होने पर अपरा ‘परा’ में बदल जाता है। यदि साधक की ध्यानयोग में गति और पूर्णता नहीं है तो सब कुछ व्यर्थ है। न किसी प्रकार की सिद्धि हो सकती है और न तो किसी प्रकार की बहिरंग साधना ही पुष्ट हो सकती है। अंतरंग साधना भूमि में तो प्रवेश करने का प्रश्न ही नहीं उठता।

पूर्ण ध्यान की उपलब्धि ‘सहज समाधि’ है। इस अवस्था विशेष् में साधक का साध्य(इष्ट) से नित्य सम्बन्ध होता है। गीता का यही ‘सातत्य योग’ है। जबतक साधक और साध्य के बीच में साधन रहेगा, तबतक पूर्ण उपलब्धि संभव नहीं।

तंत्र की बहिरंग साधना भूमि में पंचमकार(मद्य, मांस, मीन, मुद्रा और मैथुन) साधन का कार्य करते हैं। इसमें जो मदिरा है, वह ध्यानयोग की सिद्धि के निमित्त है, न कि नशे के लिए।

मदिरा में तीन तत्वों का समावेश होता है। वे तीन तत्व हैं–‘पृथ्वीतत्व’, ‘जलतत्व’ और ‘अग्नितत्व’। इन तीनों तत्वों के गुणों को अपने में समेटने वाली मदिरा के सही और उचित ढंग से तंत्र क्रिया में साधन के रूप में उपयोग करने से साधक का सूक्ष्म शरीर उसके स्थूल शरीर से पृथक हो जाता है।

सहज समाधि की अवस्था प्राप्त होने पर ‘साधनरूप मदिरा-ग्रहण’ समाप्त हो जाता है। उसके स्थान पर ‘योगमदिरा’ को स्वीकार कर अंतरंग भूमि में प्रवेश किया जाता है जिसका प्रवेश द्वार सहज समाधि की पूर्व अवस्था है और यहीं से तंत्र की अंतरंग साधना शुरू हो जाती है जो पूर्णतया योगपरक और आध्यात्मिक है। अंतरंग साधना यात्रा का प्रथम सोपान ‘सविकल्प समाधि’ है जो सहज समाधि का परिष्कृत रूप है।

यहाँ यह कहना सर्वथा उचित है कि पातंजल योग की जहाँ समाप्ति होती है, वहीँ से तंत्र की अंतरंग साधना यात्रा शुरू होती है। (यहां पर यह स्पष्ट रूप से कहना है कि महर्षि पतंजलि को इस जगह कमतर कदापि नहीं दर्शाया जा रहा है और न ही पातंजल योग की बुराई की जा रही है।

यहां मात्र कहने का इतना ही आशय है कि पातंजल योग ने जो मार्ग प्रशस्त किया उसे और आगे बढ़ाया गया है।) यह यात्रा कुण्डलिनी साधना की यात्रा है और इसका मार्ग उसीके लिए खुला है जिसने ‘सहज समाधि’ का अतिक्रमण कर सविकल्प अवस्था को प्राप्त कर लिया है।

मत्स्य—-

अभी तक हम पञ्च मकार के अंतर्गत बहिरंग साधना के साधन के रूप में मदिरा और मांस –इन दोनों साधनों पर चर्चा कर चुके हैं। तीसरा साधन है–‘मत्स्य’ या ‘मीन’ जिसका अर्थ है–मछली। तंत्रों में बहुत से संकेत अधिकांशतया रूपकों पर आधारित हैं। मत्स्य शब्द का भी यहाँ रूपक के अर्थ में ही प्रयोग हुआ है।–

गंगा यमुनायोर्मध्ये द्वौ मत्स्यौ चरतः सदा।
तौ मत्स्यौ भक्षयेत् यस्तु स भवेन्मत्स्यसाधकः।।

अर्थात्–यहाँ गंगा और यमुना शरीर में स्थित ‘इड़ा’ और ‘पिंगला’ दोनों नाड़ियाँ हैं। उन मत्स्यों का सेवन करने वाला अर्थात् प्राणायाम के द्वारा श्वास-प्रश्वास को ‘सुषुम्ना’ नाड़ी के भीतर संचालित कर लेने वाला साधक ही वास्तव में मत्स्य सेवी है।

बहिरंग साधना दीक्षा–

मानव शरीर की जितनी विशेषताएं हैं, उनमें एक यह भी है कि स्थूल शरीर के साथ अन्य शरीर भी दूध में जल की तरह मिले हुए विद्यमान रहते हैं। बहिरंग साधना तीन शरीरों द्वारा होती है–स्थूल शरीर, भाव शरीर और सूक्ष्म शरीर।

स्थूल शरीर का केंद्र हृदय है। भाव शरीर का केंद्र नाभि है। ध्यान की सिद्धि और पूर्णता भाव शरीर में होती है तथा सहज समाधि की अवस्था प्राप्त होती है सूक्ष्म शरीर में। इन दोनों शरीरों का ज्ञान होना आवश्यक है।

मन्त्र के अधिष्ठात्र देवता का दर्शन भाव शरीर द्वारा होता है। इसी प्रकार मंत्रबद्ध सूक्ष्म शरीरधारी आत्माओं का साक्षात्कार भी सूक्ष्म शरीर द्वारा ही होता है।

जो बहिरंग साधना मार्ग के उच्च साधक हैं, वे भूत-प्रेत, पिशाच, पिशाचिनी, यक्ष, यक्षिणी आदि सूक्ष्म शरीरधारी शक्ति संपन्न आत्माओं को मंत्रशक्ति के द्वारा बांधकर उनसे अपने सूक्ष्म शरीर द्वारा ही कार्य लेते हैं।

इसी प्रकार ध्यानयोग के द्वारा भाव शरीर के माध्यम से देवताओं से साक्षात्कार करते हैं। बहुत से साधक ऐसे होते हैं कि तांत्रिक क्रियाओं द्वारा स्थूल शरीर को कुछ समय के लिए त्यागकर भाव शरीर या सूक्ष्म शरीर में प्रवेश कर जाते हैं और उनके द्वारा अगम्य स्थानों की यात्रा करते हैं। इसके अतिरिक्त दूसरे के शरीर में प्रवेश कर उसके भूत, भविष्य और वर्तमान के बारे में पूरी जानकारी कर लेते हैं।

तंत्र की बड़ी ऊँची क्रिया पद्धति मानी जाती है यह। किन्तु जरा-सी चूक होने पर जान जा सकती है इसमें।

अंतरंग साधना में दीक्षा–

अंतरंग साधना में छः प्रकार की दीक्षा का क्रम है जिनमें प्रमुख है–शक्तिपात दीक्षा। साधक के बहिरंग साधना में पारंगत होने पर ही उसे अंतरंग साधना में प्रवेश मिलता है तभी वह शक्तिपात दीक्षा का अधिकारी बनता है।

साधक के पूर्व संस्कार के अनुसार यथा समय सद्गुरु स्वयम् उपस्थित होकर यह दीक्षा प्रदान करते हैं। इसका सीधा सा तात्पर्य है कि सद्गुरु अपने अन्तर्चक्षुओं के माध्यम से अपने भावी शिष्य, उसके संस्कार और उसकी साधना प्रक्रिया पर दृष्टि रखे रहते हैं।

शक्तिपात् दीक्षा के पूर्व सद्गुरु शिष्य के स्थूल शरीर को विशेष् तांत्रिक क्रिया द्वारा भाव शरीर और सूक्ष्म शरीर से अलग करते हैं और दोनों के साथ अपने भाव शरीर और सूक्ष्म शरीर का सम्बन्ध स्थापित करते हैं। इस क्रिया के बाद क्रम से दोनों शरीरों का अतिक्रमण कर मनोमय शरीर से तादात्म्य स्थापित करते हैं और उसी मनोमय शरीर में शक्तिपात् दीक्षा प्रदान करते हैं।

तंत्र ने अपना द्वार सबके लिए खोल रखा है। तांत्रिक साधना मार्ग की भूमि में कोई भी अपना पद-चिन्ह अंकित कर सकता है। कोई भी वर्ण हो, कोई भी जाति हो, स्त्री हो या हो पुरुष , किसी भी प्रकार का प्रतिबन्ध नहीं। तंत्र की ओर बहुत-से लोगों के आकर्षित होने का यही एक मात्र कारण है। सच कहा जाय तो कलियुग में तंत्र साधना ही एकमात्र सफल होती है।

इसका मतलब यह नहीं है कि कोई भी तंत्र साधना का अधिकारी बन सकता है। इस मार्ग में पात्रता होना सबसे महत्वपूर्ण है। पात्रता के अभाव में साधक इसमें आ नहीं सकता। यह कार्य गुरु का है कि वह योग्यतानुसार शिष्य की परीक्षा करे और उसके अनुसार तंत्र की दीक्षा देकर उसको इस मार्ग में प्रविष्टि दे। तांत्रिक साधना की परीक्षा अत्यन्त कठिन है। योग्य गुरु तरह-तरह से अपने शिष्य की परीक्षा लेता है और प्रत्येक दृष्टि से सफल होने पर ही उसे तंत्र की दीक्षा देता है।

मुद्रा—

मादितत्व के विचार क्रम में ‘मद्य’, ‘मांस’, और ‘मीन’ पञ्च मकारों पर विचार विश्लेषण हो चुका है। अब ‘मुद्रा’ पर विचार किया जायेगा। ब्राह्मण धर्म में साधारणतया ‘मुद्रा’ से अभिप्राय एक विशिष्ट शारीरिक क्रिया से लिया जाता है।

तंत्र में मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपूरक, अनाहत आदि चक्रों के साथ साथ ‘खेचरी’ आदि मुद्राएं तथा पूरक, कुम्भक ,रेचक आदि प्राणायामों की विवेचना है जो योगदर्शन की कर्तव्य मीमांसा में दिखाई देती है। परंतु यहाँ मुद्रा का एक दूसरा ही अर्थ है जिसका प्रमाण ‘विजय तंत्र’ के एक श्लोक से मिलता है–

सत्संगेन भवेन्मुक्तिरसत्संगेषु बन्धनम्।
असत्संगमुद्रणम् यत्त तन्मुद्रा परिकीर्तिता।।

अर्थात्–संत्सगति के प्रभाव से मुक्ति प्राप्त होती है और कुसंगति के प्रभाव से नाना प्रकार के मोह-माया आदि बन्धन प्राप्त होता है। इसी कुसंगति के त्याग का नाम ‘मुद्रा’ है। इस प्रकार ‘मुद्रा’ से तात्पर्य ‘असत्संग का परित्याग’ है।

लोग वेद, पुराण, शास्त्र, उपनिषद, दर्शन, इतिहास आदि सब कुछ पढ़ लेते हैं। कंठस्थ भी कर लेते हैं। संतुष्ट भी हो जाते हैं। अपने आप को परम ज्ञानी भी समझने लगते हैं। लेकिन रहते हैं पहले जैसे ही। उनका बाहरी व्यक्तित्व तो अवश्य बदल जाता है, लेकिन आतंरिक स्थिति पहले जैसी ही रहती है।

उनका ज्ञान उनके आतंरिक स्वरूप को परिवर्तित नहीं कर पाता है। पहले ही जैसे रहते हैं वे लोग–क्रोधी, दंभी, अहंकारी, कपटी, ईर्ष्यालु, असत्यवादी। उपलब्ध ज्ञान के अनुसार उनका आचरण नहीं होता।

लेकिन तंत्र ऐसा नहीं है। वह न वेद है, न शास्त्र है, न पुराण है, न उपनिषद है, न तो है कोई दर्शन ही। वह तो क्रियापरक विधि का प्रकृष्ट परम विज्ञान है। उसकी भाषा क्रिया की भाषा है और है विधि की भाषा।

भौतिक विज्ञान की तरह देश-काल के अनुसार उसके नियम, सिद्धान्त, क्रिया और विधियां बदलती नहीं। हर युग में, हर काल में और हर अवस्था में एक सी रहती हैं। इसीलिए वह प्रकृष्ट विज्ञान है। वह सर्वव्यापिनी महाशक्ति का विज्ञान है। जिसकी उपयोगिता क्रिया में है, इसीलिए वह गुह्य और गोपनीय है।

वेद और तंत्र भारतीय साधना-संस्कृति के मूल तत्व हैं। वेद परम ज्ञान है और तंत्र है–गुह्य ज्ञान। यह योग्य और संस्कार संपन्न लोगों के लिए है। शुभ संस्कार के उदय होने पर तंत्र में रूचि जाग्रत होती है।

उच्च संस्कारों के उदय होने पर सद्गुरु के दर्शन होते हैं। उच्चतम संस्कार के जागने पर सद्गुरु के मार्गदर्शन से सिद्धिलाभ होता है। फिर सिद्धिलाभ के परे है–महाशक्ति का करुणामय अनुग्रह का उपलब्ध् होना।

 

यह करुणामय अनुग्रह ही साधक की सबसे बड़ी परम संपत्ति है और यह परम संपत्ति ही परम कल्याणकारी है। सच तो यह है कि तब साधक स्वयम् माँ महामाया जगज्जननी का साकार रूप हो जाता है। वह खिला हुआ सुगन्धित पुष्प की तरह हो जाता है जिसकी सुगन्ध बराबर चारों ओर बिखरती ही रहती है।

मनुष्य अपनी जिज्ञासा लिए हुए हर जगह भटकता रहता है कि कब उसका समाधान हो। समाधान तभी सम्भव है जब मनुष्य में योग्यता होगी। योग्यता जाति, धर्म और संप्रदाय नहीं देखती। हम हिन्दू हैं, मुस्लमान हैं, ईसाई हैं, जैन हैं। भीतर तो हम सभी एक हैं, समान हैं–वही क्रोध, वही घृणा, वही द्वेष, वही ईर्ष्या, वही हिन्सा, वही कामुकता और वही आक्रामकता। सभी में बराबर है। कहीं कोई अन्तर नहीं।

जो वास्तविकता है, वह सभी जाति में, सभी धर्म में समान है। हिन्दू, मुसलमान, सिख, ईसाई , जैन आदि जो भी लोग हैं, समान हैं। तंत्र के लिए जाति, धर्म, संप्रदाय अपना आवरण है। आवरण को वह कोई महत्त्व नहीं देता। तंत्र देखता है केवल और केवल योग्यता। हम जहाँ हैं, जिस स्थिति में हैं, एक अंधे के समान हैं और उसी अंधेपन को दूर करना ही तंत्र का काम है।

समस्त तंत्र शंकर और पार्वती के बीच संवाद है। पार्वती का प्रश्न और शंकर का उत्तर है। लेकिन वह संवाद अर्थपूर्ण है, साधरण गुरु-शिष्य के बीच का संवाद नहीं है। दो महान् प्रेमी-प्रेमिका के बीच का गहन और गम्भीर संवाद है, गहनतम प्रेम की भाषा है। प्रत्येक अक्षर प्रेममय है। इसकी भाषा आत्मा को स्पर्श करने वाली है।

तंत्र का कहना है कि शिष्य में प्रेम के साथ ग्राहकता भी होनी चाहिए, तभी विज्ञान प्रकाश में आता है। शिष्य के लिए स्त्री का होना आवश्यक नहीं लेकिन उसमें स्त्रैण ग्राहकता का भाव अवश्य होना चाहिए।

पार्वती के प्रश्न का अर्थ ही है कि स्त्रैण भाव प्रश्न कर रहा है। स्त्रैण भाव का मतलब ही है ग्राहकता और समर्पण। प्रेम भी पूर्ण है। प्रेम में गंभीरता नहीं, निर्मलता और समर्पण होता है।

पुरुष और स्त्री के अस्तित्व पर यदि हम वैज्ञानिक दृष्टि से विचार करें तो मनुष्य पुरुष और स्त्री दोनों है। कोई भी मनुष्य न मात्र पुरुष है और न तो मात्र स्त्री है। वह उभयलिंगी है। उसमें दोनों यौन हैं। शंकर का एक स्वरुप ‘अर्धनारीश्वर’ है।

भरतीय संस्कृति की यह गहन धारणा है। स्त्री भी न पूर्ण स्त्री है और न तो है पूर्ण पुरुष। इसीलिये पार्वती केवल प्रिया ही नहीं, पत्नी ही नहीं, शंकर की अर्धांगिनी भी हैं।

 

जबतक शिष्य गुरु का अर्धांग नहीं बन जाता है, तबतक ज्ञान-विज्ञान की उच्च शिक्षा नहीं दी जा सकती। गुह्य विधियों के विषय में कुछ भी नहीं बतलाया जा सकता। जब तक हम ऐसा नहीं बनेंगे तबतक कोई सार्थक लाभ नहीं। मृतज्ञान का भार ढोते रहेंगे हम जीवन भर और डूबे रहेंगे अहंकार के सागर में।

मैथुन–

तंत्र के कौलाचार में पांचवां और अंतिम मकार है–‘मैथुन’। लेकिन यह होना चाहिए कि यह आधार भी विषयवासना को विनाश का प्रमुख कारण मानता है। —

केवलं विषयासक्तः पतत्येव न संशयः।
आचार लांघनाद्देवि कौलिकः पतितो भवेत्।।

अर्थात्–शंकर पार्वती से कह रहे है कि हे देवि ! वह व्यक्ति जो विषयों में ही केवल आसक्त होता है, उसका पतन होता है, इसमें कोई संशय नहीं है। जो कौलाचारी साधक अपने आचार का उल्लघन करता है, वह पतित हो जाता है।

तंत्र के अनुसार अत्यन्त मजबूत लोहे के पाशों से लोहा-लकड़ी आदि में बद्ध मनुष्य भी मुक्त हो सकता है, परंतु स्त्री, धन आदि में आसक्त मनुष्य कभी मुक्त नहीं हो सकता। इतना ही नहीं, जितनी भी स्त्रियां हैं, सभी कौलाचारियों के लिए माँ के समान हैं। उनके मन में जरा भी विषय विकार आने पर कुल योगिनियां उसका सर्वनाश कर देती हैं।–

या काचिदंगना लोके सा मातृकुलसंभवा।
कुप्यन्ति कुलयोगिन्यो बनितानांव्यतिक्रमात।।

समाज को इस प्रकार का अर्थ ग्रहण करने के लिए मजबूर किया इस आचार में वर्णित ‘कुमारीं पूजन’ प्रकरण ने जिसमें नवरात्र में कुमारी पूजन का कुलदेवी के सामने करने का विधान है। लेकिन वहीँ यह भी देखना आवश्यक है उस प्रसंग में कुमारी के लिए ‘देवता बुद्धया’ शब्द कई बार दुहराया गया है।

‘मैथुन’ पञ्च मकार के रहस्य को समझाते हुए तंत्र कहता है कि आत्मा और पराशक्ति के संयोग से उत्पन्न आनन्द के आस्वादन का नाम ‘मैथुन’ है। इसके विपरीत अर्थ का प्रयोग करने वाले मात्र ‘स्त्री सेवक’ हैं, कौलाचारी नहीं।–

पर शक्त्यात्ममिथुन सन्योगानंदनिर्भरः।
य आस्ते मैथुनं तत्स्यादपरे स्त्रिनिषेवकाः।।

यह सिद्धि बिना विषयवासना पर विजय प्राप्त किये हो ही नहीं सकती। कामवासना को जीतना परम आवश्यक माना गया है। इसलिए तो युवती स्त्री को ‘निर्विकार चित्तेन’ पूजा करने का विधान है।

सहस्रार में स्थित शिव और कुंडलिंनी अथवा प्राण और सुषुम्ना का मिलन का नाम ही ‘,मैथुनं’ है। शास्त्रों के निर्देश को ताख पर रखकर जो साधक अनैतिक आचरण करता है, उसे सिद्धि तो दूर की बात रही, नरक गामी बनना पड़ता है।

इस प्रकार यह स्पष्ट है कि कौलाचार के ये पांचों मकार अंतर्योग से सम्बंधित हैं। इनको भौतिक अर्थ में ग्रहण करना भारी भूल है।

– इति समाप्तम –

– साभार पंडित शिवराम तिवारी

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