🔱 महामृत्युंजय मंत्र 🔱

*महामृत्युंजय मंत्र में 33 अक्षर हैं जो महर्षि वशिष्ठ के अनुसार 33 कोटि (प्रकार) के देवताओं के घोतक हैं।*

*महामृत्युंजय* मन्त्र से शिव की आराधना करने पर समस्त देवी देवताओं की आराधना स्वमेव हो जाती है।

उन तैंतीस कोटि देवताओं में 8 वसु 11 रुद्र और 12 आदित्य 1 प्रजापति तथा 1 षटकार हैं।

इन तैंतीस कोटि देवताओं की सम्पूर्ण शक्तियाँ महामृत्युंजय मंत्र से निहीत होती हैं, जिससे महा महामृत्युंजय का पाठ करने

वाला प्राणी दीर्घायु तो प्राप्त करता ही है

साथ ही वह निरोगी, ऐश्वर्य युक्त व

धनवान भी होता है।

महामृत्युंजय का पाठ करने वाला प्राणी हर दृष्टि से सुखी एवम समृध्दिशाली होता है।

*भगवान शिव की अमृतमय कृपा उस पर निरन्तंर बरसती रहती है।*

महामृत्युञ्जय मंत्र यजुर्वेद के रूद्र अध्याय में स्थित एक मंत्र है। इसमें शिव की स्तुति की गयी है। शिव को ‘मृत्यु को जीतने वाला’ माना जाता है।

मंत्र इस प्रकार है –

*ॐ त्र्यम्बकं यजामहे*

*सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।*

*उर्वारुकमिव बन्धनान्*

*मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥*

महामृत्युंजय मंत्र (संस्कृत:

महामृत्युंजय मंत्र “मृत्यु को जीतने वाला महान मंत्र” जिसे त्रयंबकम मंत्र) भी

कहा जाता है,ऋग्वेद का एक श्लोक है।

यह त्रयंबक “त्रिनेत्रों वाला”, रुद्र का विशेषण शिव को संबोधित है।

यह श्लोक यजुर्वेद में भी आता है।

गायत्री मंत्र के साथ यह समकालीन हिंदू धर्म का सबसे व्यापक रूप से जाना जाने वाला मंत्र है।

शिव को मृत्युंजय के रूप में समर्पित महान मंत्र ऋग्वेद में पाया जाता है।

इसे मृत्यु पर विजय पाने वाला महामृत्युंजय मंत्र कहा जाता है। इस मंत्र के कई नाम और

रूप हैं।

इसे शिव के उग्र पहलू की ओर संकेत करते हुए रुद्र मंत्र भी कहा जाता है;

शिव के तीन आँखों की ओर इशारा करते हुए त्रयंबकम मंत्र और इसे कभी कभी मृत संजीवनी मंत्र के रूप में जाना जाता है क्योंकि यह कठोर तपस्या पूरी करने के

बाद पुरातन ऋषि शुक्र को प्रदान की गई “जीवन बहाल” करने वाली विद्या का एक

घटक है।

ऋषि-मुनियों ने महा मृत्युंजय मंत्र को वेद का ह्रदय कहा है।

चिंतन और ध्यान के लिए प्रयोग किए जाने वाले अनेक मंत्रों में गायत्री मंत्र के साथ इस मंत्र का सर्वोच्च स्थान है।

*||महा मृत्युंजय मंत्र का अर्थ||*

”समस्त संसार के पालनहार, तीन नेत्र वाले शिव की हम आराधना करते हैं।

विश्व में सुरभि फैलाने वाले भगवान शिव मृत्यु न कि मोक्ष से हमें मुक्ति दिलाएं।”

महामृत्युंजय मंत्र के वर्णो (अक्षरों) का अर्थ:

महामृत्युंघजय मंत्र के वर्ण पद

वाक्यक चरण आधी ऋचा और सम्पुतर्ण ऋचा-इन छ: अंगों के अलग-अलग अभिप्राय हैं।

ओम त्र्यंबकम् मंत्र के 33 अक्षर हैं जो महर्षि वशिष्ठ के अनुसार 33 कोटि (प्रकार) देवताओं के घोतक हैं।

उन तैंतीस देवताओं में 8 वसु 11 रुद्र और 12 आदित्यठ 1 प्रजापति तथा 1 षटकार हैं।

इन तैंतीस कोटि देवताओं की सम्पूर्ण शक्तियाँ महामृत्युंजय मंत्र से निहीत होती है जिससे महा महामृत्युंजय का पाठ करने वाला प्राणी दीर्घायु तो प्राप्त करता ही हैं।

साथ ही वह निरोगी, ऐश्वर्ययुक्त धनवान भी होता है।

महामृत्युंजय का पाठ करने वाला प्राणी हर दृष्टि से सुखी एवम समृद्धिशाली होता है।

भगवान शिव की अमृतममयी कृपा उस पर निरन्तंर बरसती रहती है।

*त्रि* – ध्रववसु प्राण का घोतक है जो सिर में स्थित है।

*यम* – अध्ववरसु प्राण का घोतक है, जो मुख में स्थित है।

*ब* – सोम वसु शक्ति का घोतक है, जो दक्षिण कर्ण में स्थित है।

*कम* – जल वसु देवता का घोतक है,जो वाम कर्ण में स्थित है।

*य* – वायु वसु का घोतक है, जो दक्षिण बाहु में स्थित है।

*जा*- अग्नि वसु का घोतक है, जो बाम बाहु में स्थित है।

*म* – प्रत्युवष वसु शक्ति का घोतक है,जो दक्षिण बाहु के मध्य में स्थित है।

*हे* – प्रयास वसु मणिबन्धत में स्थित है।

*सु* -वीरभद्र रुद्र प्राण का बोधक है,यह दक्षिण हस्त के अंगुलि के मूल में स्थित है।

*ग* -शुम्भ् रुद्र का घोतक है, जो दक्षिणहस्त् अंगुलि के अग्रभाग में स्थित है।

*न्धिम्* -गिरीश रुद्र शक्ति का मूल घोतक है,यह बायें हाथ के मूल में स्थित है।

*पु*- अजैक पात रुद्र शक्ति का घोतक है। वाम हस्त के मध्य भाग में स्थित है।

*ष्टि* – अहर्बुध्य्त् रुद्र का घोतक है, वाम हस्त के मणिबन्ध में स्थित है।

*व* – पिनाकी रुद्र प्राण का घोतक है,जो बायें हाथ की अंगुलि के मूल में स्थित है।

*र्ध* – भवानीश्वपर रुद्र का घोतक है,यह वाम हस्त अंगुलि के अग्रभाग में स्थित है।

*नम्* – कपाली रुद्र का घोतक है, जो उरु मूल में स्थित है।

*उ*- दिक्पति रुद्र का घोतक है जो यक्ष जानु में स्थित है।

*र्वा* – स्थाणु रुद्र का घोतक है जो यक्ष गुल्फ् में स्थित है।

*रु* – भर्ग रुद्र का घोतक है, जो चक्ष पादांगुलि मूल में स्थित है।

*क* – धाता आदित्यद का घोतक है जो यक्ष पादांगुलियों के अग्र भाग में स्थित है।

*मि* – अर्यमा आदित्यद का घोतक है जो वाम उरु मूल में स्थित है।

*व* – मित्र आदित्यद का घोतक है जो वाम जानु में स्थित है।

*ब* – वरुणादित्या का बोधक है जो वाम गुल्फा में स्थित है।

*न्धा* – अंशु आदित्यद का द्योतक है,जो वाम पादंगुलि के मूल में स्थित है।

*नात्* – भगादित्य का बोधक है।यह वाम पैर की अंगुलियों के अग्रभाग में स्थित है।

*मृ*– विवस्व्न (सुर्य) का घोतक है जो दक्ष पार्श्वि में स्थित है।

*र्त्यो्* – दन्दाददित्य् का बोधक है,जो वाम पार्श्वि भाग में स्थित है।

*मु* – पूषादित्यं का बोधक है।पृष्ठै भाग में स्थित है।

*क्षी* – पर्जन्य् आदित्यय का द्योतक है जो नाभि स्थल में स्थित है।

*य* – त्वणष्टान आदित्यध का बोधक है,यह गुहय भाग में स्थित है।

*मां* – विष्णुय आदित्यय का द्योतक है यह शक्ति स्वरूप दोनों भुजाओं में स्थित है।

*मृ* – प्रजापति का द्योतक है जो कंठ भाग में स्थित है।

*तात्* – अमित वषट्कार का द्योतक है जो हदय प्रदेश में स्थित है।

उपर वर्णन किये स्थानों पर उपरोक्त देवता, वसु आदित्य आदि अपनी सम्पूर्ण शक्तियों

सहित विराजित हैं।

जो प्राणी श्रद्धा सहित महामृत्युंजय मंत्र का पाठ करता है उसके शरीर के अंग – अंग

(जहां के जो देवता या वसु अथवा आदित्यप हैं) उनकी रक्षा होती है।

मंत्रगत पदों की शक्तियाँ जिस प्रकार मंत्र में अलग अलग वर्णो (अक्षरों) की शक्तियाँ हैं।

उसी प्रकार अलग – अलग पदों की भी शक्तियाँ है।

*त्र्यम्बकम्* – त्रैलोक्यक शक्ति का बोध कराता है जो सिर में स्थित है।

*यजा*- सुगन्धात शक्ति का द्योतक है जो ललाट में स्थित है।

*महे*- माया शक्ति का द्योतक है जो कानों में स्थित है।

*सुगन्धिम्* – सुगन्धि शक्ति का द्योतक है जो नासिका (नाक) में स्थित है।

*पुष्टि* – पुरन्दिरी शक्ति का द्योतक है जो मुख में स्थित है।

*वर्धनम* – वंशकरी शक्ति का द्योतक है जो कंठ में स्थित है।

*उर्वा* – ऊर्ध्देक शक्ति का द्योतक है जो ह्रदय में स्थित है।

*रुक* – रुक्तदवती शक्ति का द्योतक है जो नाभि में स्थित है।

*मिव* – रुक्मावती शक्ति का बोध कराता है जो कटि भाग में स्थित है।

*बन्धानात्* – बर्बरी शक्ति का द्योतक है जो गुह्य भाग में स्थित है।

*मृत्यो*: – मन्त्र्वती शक्ति का द्योतक है जो उरुव्दंय में स्थित है।

*मुक्षीय* – मुक्तिकरी शक्तिक का द्योतक है जो जानुव्दओय में स्थित है।

*मा* – माशकिक्तत सहित महाकालेश का बोधक है जो दोंनों जंघाओ में स्थित है।

*अमृतात* – अमृतवती शक्ति का द्योतक है जो पैरो के तलुओं में स्थित है।

*महा मृत्युंजय मंत्र का अक्षरशः अर्थ*

त्रयंबकम = त्रि-नेत्रों वाला

(कर्मकारक)

यजामहे = हम पूजते हैं, सम्मान करते हैं, हमारे श्रद्देय

सुगंधिम (कर्मकारक)

पुष्टि = एक सुपोषित स्थिति,

फलने-फूलने वाली, समृद्ध

जीवन की परिपूर्णता,

वर्धनम = वह जो पोषण करता

है, शक्ति देता है, (स्वास्थ्य,धन,

सुख में) वृद्धिकारक; जो हर्षित

करता है, आनन्दित करता है

और स्वास्थ्य प्रदान करता है,

एक अच्छा माली,

उर्वारुकम= ककड़ी

(कर्मकारक),

इव= जैसे, इस तरह,

बंधना= तना (लौकी का);

(“तने से” पंचम विभक्ति –

वास्तव में समाप्ति -द से

अधिक लंबी है जो संधि

के माध्यम से न/अनुस्वार

में परिवर्तित होती है),

मृत्योर = मृत्यु से,

मुक्षीय = हमें स्वतंत्र करें,

मुक्ति दें, मा= न,

अमृतात= अमरता,मोक्ष,

*सरल अनुवाद;*

हम त्रि-नेत्रीय वास्तविकता का चिंतन करते हैं जो जीवन की मधुर परिपूर्णता को पोषित

करता है और वृद्धि करता है। ककड़ी की तरह हम इसके तने से अलग (“मुक्त”) हों, अमरत्व से नहीं बल्कि मृत्यु से हों।

*संदर्भ 😗

*महामृत्युंजय मंत्र का प्रभाव*

बड़ी तपस्या से ऋषि मृकण्ड के पुत्र हुआ।

कितु ज्योतिर्विदों ने उस शिशु के लक्षण देखकर ऋषि के हर्ष को चिंता में परिवर्तित कर दिया। उन्होंने कहा यह बालक अल्पायु है। इसकी आयु केवल बारह वर्ष है।

मृकण्ड ऋषि ने अपनी पत्नी को आश्वत किया- देवी, चिंता मत करो। विधाता जीव के कर्मानुसार ही आयु दे सकते हैं, किन्तु मेरे स्वामी समर्थ हैं। भाग्यलिपि को स्वेच्छानुसार परिवर्तित कर देना भगवान शिव के लिए विनोद मात्र है।

ऋषि मृकण्ड के पुत्र मार्कण्डेय बढऩे लगे। शैशव बीता और कुमारावस्था के प्रारंभ में ही पिता ने उन्हें शिव मंत्र की दीक्षा तथा शिवार्चना की शिक्षा दी।

पुत्र को उसका भविष्य बताकर समझा दिया कि पुरारी ही उसे मृत्यु से बचा सकते हैं।

माता-पिता तो दिन गिन रहे थे। बारह वर्ष आज पूरे होंगे। मार्कण्डेय मंदिर में बैठे थे। रात्रि से ही उन्होंने मृत्युंजय मंत्र की शरण ले रखी थी-

*”त्र्यम्बक यजामहे*

*सुगन्धिं पुष्टिवर्धन्म।*

*उर्वारुकमिव बन्धना*

*मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्।”*

सप्रणव बीजत्रय-सम्पुटित महामृत्युंजय मंत्र चल रहा था।

काल किसी की भी प्रतीक्षा नहीं करता। यमराज के दूत समय पर आए और संयमनी लौट गए। उन्होंने अपने स्वामी यमराज से जाकर निवेदन किया हम मार्कण्डेय तक पहुंचने का साहस नहीं कर पाए।

इस पर यमराज ने कहा कि मृकण्ड के पुत्र को मैं स्वयं लाऊंगा। दण्डधर यमराज जी महिषारूढ़ हुए और क्षण भर में मार्कण्डेय के पास पहुंच गए।

बालक मार्कण्डेय ने उन कज्जल कृष्ण, रक्तनेत्र पाशधारी यम को देखा तो सम्मुख की लिंगमूर्ति से लिपट गया।

”हुम्” एक अद्भुत अपूर्व हुंकार और मंदिर, दिशाएं जैसे प्रचण्ड प्रकाश से चकाचौंथ हो गईं।

शिवलिंग से तेजोमय त्रिनेत्र गंगाधर चन्द्रशेखर प्रकट हो गए थे और उन्होंने त्रिशूल उठा लिया था और यमराज से कहा कि तुम मेरे आश्रित पर पाश उठाने का साहस केसे करते हो ?

यमराज ने डांट पडऩे से पूर्व ही हाथ जोडक़र मस्तक झुका लिया था और कहा कि मैं आप

का सेवक हूं। कर्मानुसार जीव को इस लोक से ले जाने का निष्ठुर कार्य प्रभु ने इस सेवक को दिया है।

भगवान चंद्रशेखर ने कहा कि यह संयमनी नहीं जाएगा। इसे मैंने अमरत्व दिया है।

मृत्युंजय प्रभु की आज्ञा को यमराज अस्वीकार कैसे कर सकते थे ? यमराज खाली हाथ लौट गए। मार्कण्डेय ने यह देख लिया।

*उर्वारुकमिवबन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्।*

वृन्तच्युत खरबूजे के समान मृत्यु के बन्धन से छुड़ाकर मुझे अमृतत्व प्रदान करें।

मंत्र के द्वारा चाहा गया वरदान उस के सम्पूर्ण रूप से उसी समय मार्कण्डेय को प्राप्त हो गया।

भाग्यलेख औरों के लिए अमिट होगा, कितु आशुतोष के आश्रितों के लिए भाग्यलेख क्या?

भगवान ब्रह्मा भाग्यविधाता स्वयं भगवती पार्वती से कहते हैं-

*”बावरो रावरो नाह भवानी।”*

*||महा मृत्युंजय मंत्र||*

*ॐ हौं जूं सः ॐ भूर्भुवः स्वः*

*ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं*

*पुष्टिवर्धनम् उर्वारुकमिव*

*बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्*

*ॐ स्वः भुवः भूः ॐ सः जूं हौं ॐ !!*

*महामृत्युंजय प्रयोग के लाभ*

*कलौकलिमल ध्वंयस*

*सर्वपाप हरं शिवम्।*

*येर्चयन्ति नरा नित्यं*

*तेपिवन्द्या यथा शिवम्।।*

*स्वयं यजनित चद्देव*

*मुत्तेमा स्द्गरात्मवजै:।*

*मध्यचमा ये भवेद*

*मृत्यैतरधमा साधन क्रिया।।*

*देव पूजा विहीनो य:*

*स नरा नरकं व्रजेत।*

*यदा कथंचिद् देवार्चा*

*विधेया श्रध्दायान्वित।।*

*जन्मचतारात्र्यौ* *रगोन्मृदत्युतच्चैरव*

*विनाशयेत्।*

*कलियुग में केवल शिवजी की पूजा फल देने वाली है।*

समस्तं पाप एवं दु:ख भयशोक आदि का हरण करने के लिए महामृत्युंजय की विधि

ही श्रेष्ठ है।

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*गंगातरंग रमणीय*

*जटाकलापं गौरीनिरंतर*

*विभूषित वामभागम।*

*नारायण प्रियमनगं*

*मदापहारं वाराणसीपुर*

*पतिं भजविश्वनाथम।।*

*नमः सर्वहितार्थाय*

*जगदाधार हेतवे।*

*साष्टांङ्गोऽयं प्रणामस्ते*

*प्रयत्नेन मया कृतः।।*

*पापोऽहं पापकर्माहं*

*पापात्मा पापसम्भवः।*

*त्राहि मां पार्वतीनाथ*

*सर्वपापहरो भव।।*

*ॐ भूर्भुवः स्वः श्रीनर्मदेश्वर*

*साम्ब सदा शिवाय नमः,*

*प्रार्थनापूर्वक नमस्कारान्* *समर्पयामि।*

*ॐ नमः शिवाय*,

*समस्त चराचर प्राणियोँ एवं सकल विश्व का कल्याण करो प्रभु !*

*जयति पुण्य सनातन संस्कृति*

*जयति पुण्य भूमि भारत*

*जयतु जयतु हिन्दू राष्ट्रम

*कष्ट हरो, काल हरो*

*दुःख हरो, दारिद्रय हरो*

*हर हर महादेव*

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